रिश्ते

बचपन और मेरा रिश्ता कभी नजदीकी न रहा,

किस भागमदौड़ में कब गुजरा, पता ही न चला,

बिन बताए ही चला गया, मैं उसे ढूँढता ही रहा,

पुकारता ही रह गया, लेकिन वो क्यों सुननेवाला।

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रिश्तों और मेरा रिश्ता कभी नजदीकी न रहा,

ढूँढता ही रह गया मयखानों और बाजारों में,

लेकिन कभी इन जगहों में उनका बसेरा न रहा,

खबर नहीं थी, मिलेंगे वो दोस्तों के शहरों में।

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जिंदगी और मेरा रिश्ता कभी नजदीकी न रहा,

दोस्तों के साथ मस्ती न जाने कहाँ चली गई,

अपनों का साथ क्या, गैरों का सहारा न रहा,

रिश्तों की गर्मी, वो धूप न जाने कहाँ चली गई।

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कविता और मेरा रिश्ता कभी नजदीकी न रहा,

मैं चाहता तो बहुत था, उसने पास आने न दिया,

बस दूर से उसकी सुन्दरता को सराहता ही रहा,

इस जनम में तो उसने कभी हाथ लगाने न दिया।

(c) आलोक कुमार & vachaal.com

थेत्थर

झारखण्ड में एक झाड़ होती है – थेत्थर. थेत्थर वैसे तो देसी शब्द है लेकिन काफ़ी हद तक उस के लिए उपयुक्त शब्द बेशर्म है. थेत्थर की ख़ास बात यह होती है कि आप उसे समूल नष्ट नहीं कर सकते, कहीं न कहीं से फिर उग आता है. वैसे उसकी एक और ख़ास बात होती है – उस से मारने पर चोट तो नहीं लगती लेकिन नीली नीली धारियाँ कुछ ऐसी छोड़ता है लगता है मानों कहीं से कुट कर आए हों.

इस प्रलाप का क्या प्रयोजन?

वस्तुतः मुझे भारतीय लोकतंत्र थेत्थर प्रतीत होता है. सन 1950 से इस की ह्त्या हो रही है. 69 वर्षों से लगातार, अनवरत लेकिन थेत्थर के माफ़िक फिर से उग आता है. लेकिन, मजे की बात यह है कि चुनाव परिणाम आते ही ह्त्या होने लगती है. हर पराजित चुनाव परिणाम को ही लोकतंत्र की ह्त्या बताता है.

यह रक्तबीज नहीं है यह अपने आप नहीं उगता, बल्कि इसे विपक्ष पुनर्जीवित करता है. किराये की कोख में पले शिशु से कौन प्यार करे? यही हाल लोकतंत्र का है. सत्ता पक्ष हमेशा लोकतंत्र की ह्त्या करना चाहता है, यह मैं नहीं कह रहा बल्कि विपक्ष कह रहा है, और विपक्ष उसे पालता रहता है. पाले बदल जाते हैं जो कल विपक्ष में थे आज सत्ता में हैं और अब वे लोकतंत्र की ह्त्या कर रहे हैं और कल का सत्ता पक्ष विपक्ष में आ कर इस अवांछनीय शिशु का पालन करता है.

लेकिन जो भी कहो यह बड़ा ही थेत्थर है, वापस आ जाता है हर पांचवें साल लोकतंत्र के पर्व के नाम पर, अपनी ह्त्या पुनः करवाने को. और तमाम सुपारी लेने वाले हत्यारे एक दूसरे पर आरोप मढ़ते है – लोकतंत्र की ह्त्या तब नहीं हुई थी जब…..

लोकतंत्र

हाड़ कंपकंपाने देने वाली रात के अल्लसुबह किसी ने दरवाज़ा खड़काया. मैंने करवट बदली और सो गया – साला, कुत्ता होगा. ज़रा देर तक निःशब्दता रही फिर किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी, अब की बार जोर से लगातार. भुनभुनाता हुआ उठा – कौन है भाई? जवाब मिला – मैं हूँ लोकतंत्र. यह कौन कमबख्त आ मरा सुबह सुबह. लोकनाथ मेरा मित्र है, तंत्रनाथ जी से भी ठीक ठाक परिचय है, लेकिन यह लोकतंत्र, समझ में न आया? आज कल ऐसे भी चोर उचक्कों का भय रहता है, लिहाज़ा टरकाना भली समझा – यार सुबह सुबह सोने दो. जवाब मिला – अभी तक तो सो ही रहे हो. यार, कहीं बुद्ध की आत्मा तो इस लोकतंत्र में नहीं आ गयी, ऐसा ही कुछ कहा था अंगुलिमाल से – तुम कब रुकोगे. सुबह की नींद का सत्यानाश पिट चुका था, अवांछनीय आगंतुक के लिए दरवाजा खोला. एक कृशकाय वृद्ध, हर जगह से टूटा फूटा किसी तरह खड़ा था. मेरी इंसानियत, जो आम भारतीयों की तरह कभी कभी ही जागती है, जाग गयी. अन्दर लिया, बाबा इस ठंढ में क्या कर रहे हो? चाय पियोगे? वृद्ध ने कहा – तुम चाय पर चर्चा करते रहो, मेरी ह्त्या हो रही है. मेरी इंसानियत हवा हो गयी, इसका पीछा करने वाले इसके पीछे मेरे घर घुस आए तो? मेरा भी नंबर साथ ही लग जाना है. मैंने कहा – बाबा जाओ, मुझे भी दफ़्तर के लिए तैयार होना है. बाबा – और वहाँ जा कर क्या करना है? भारतीय राजनीति पर चर्चा?

मैं चुप. चुपचाप चाय की चुस्कियाँ लेता रहा. एक लम्बे मौन के बाद बाबा ने कहा – मेरी बात सुन लो, कम से कम जी का बोझ हल्का हो जाएगा, मैं तुम्हारे सिर पर बोझ भी नहीं बनूँगा, अपनी बात रखूँगा और निकल जाऊँगा, वैसे ही जैसे तुम्हारे देश से रुखसत होने को हूँ. मैंने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा – बाबा मेरा घर मेरे देश में ही है. लेकिन, आप अपनी बात रखिये.

मेरी ह्त्या की साजिश सन 1946 से रची जा रही है. पक्ष और विपक्ष दोनों ही एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं कि सामने वाला लोकतंत्र की ह्त्या कर रहा है. पर मैं बेशर्म डटा हुआ हूँ. कभी बूथ लूट कर तो कभी आपात काल लगा कर, कभी एक के तुष्टिकरण के साथ तो कभी दूसरे का साथ देकर. मैं द्रौपदी का वस्त्र हूँ, लगातार चीर हरण के बाद भी तन पर विद्यमान हूँ. मैं एक रक्तबीज हूँ, एक लोकतंत्र गिरेगा तो दूसरा उठ खड़ा होगा.

अच्छा तो आप वह वाले लोकतंत्र हो. पर मुझे यह सब क्यों बता रहे हो, बाबा? मैं कोई नेता हूँ क्या?

नहीं, तुम आम मतदाता हो और अगर तुझ में चेतना जाग गयी तो मैं पुनः तंदुरुस्त हो जाऊँगा, वरना रोज मार खाऊँगा और इस से भी जर्जर हालत में पहुँच जाऊँगा. पर जैसा कि तुम्हारे संविधान में लिखा है – बार बार मारा जाऊँगा लेकिन लड़खड़ाता हुआ अगले चुनावों तक फिर खड़ा हो जाऊँगा.

एक और सावित्री – सत्यवान

30 फरवरी 2150 : अमा, तारीख़ पर न जाइये. यह तारीख़ अगर नहीं हो सकती तो आगे लिखी बातों पर आप क्या ख़ाक यकीन करेंगे.
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सावित्री और सत्यवान एक दम Made for Each Other जोड़ी. सावित्री MBBS, MD वैगेरह कर एक बड़े विदेशी Bank में CFO के पद पर आसीन और सत्यवान – Chemical Engineering में IIT से B Tech और Finance में IIM की Degree ले कर एक Software Firm का Offsite Developer. उम्र यही कोई 35 साल. सावित्री ने सत्यवान को कहा मुझे अपने कई जन्म पूर्व के जन्म की याद है, तब भी हम सावित्री और सत्यवान ही थे. तब जो गलती की, वह अब नहीं दुहराना चाहिए. हमें अपने परिवार में नए सदस्य लाने की योजना बनानी चाहिए. सत्यवान ने कहा – जैसी देवि की इच्छा.

लेकिन इच्छा तो हरि की चलती है, देवी की नहीं, रात यमराज आ गए. CCTV के Screen पर सावित्री ने देखा, भागती दौड़ती यमराज के पास पहुँची – हे प्रभु, मैं सत्यवान के बिना कैसे रहूँगी? इन्हें छोड़ दो. यमराज ने कहा – इसका काल पूरा हो चुका है और अब इसे जाना ही होगा. थोड़ा समय बचा है, तमाम Financial Matter Discuss कर लो. सावित्री – हे प्रभु, आज ही तो हमने अपनी Family Plan की थी, कम से कम दो बच्चे तो हो जाने दो. यमराज – हे देवि, हर जन्म में तुम यही वरदान माँग कर मुझे अपने कर्तव्य से च्युत कर देती हो, कोई और वरदान मांग लो. सावित्री भी ज़िद पर आ गयी. अब स्त्री के सामने तो किसी की नहीं चली, बहस में यमराज क्या ख़ाक जीतते. हथियार डालने को ही थे कि दिमाग में कौंध सी आई.

मुस्कुराए – देवि, जैसा तुम उचित समझो, तुम जितनी संतान चाहोगी होगी.
सावित्री – धन्यवाद प्रभु, आप ने मेरे स्त्रीत्व का मान रख लिया.
यमराज – देवि, तुम निष्णात चिकित्सिका हो, अपने जीवित पति के वीर्य निकाल कर सुरक्षित रख लो, फिर IVF तो है ही. जितनी इच्छा, आबादी में योगदान दो.
सावित्री – प्रभु गत कई वर्षों से Banker हूँ, Medical Science से अब क्या वास्ता.
यमराज – हे देवि, अब तो गली गली IVF Centre खुल गए हैं. कहीं भी ले जा कर अपनी भावी संतानों को सुरक्षित रख लो.

जय हो आधुनिक चिकित्सा पद्धति की – यमराज ने उद्घोष किया. सतयुग के बाद कलियुग में ही सही, यमराज सत्यवान के प्राण हरने में सफल हुए.

वामपंथी

कहते हैं द्वापर युग तक पढ़े लिखे विद्वान लोग भविष्य में झाँक लेते थे, यहाँ तक कि सटीक नाम और स्थान भी बता सकते थे.

कहानी महाभारत कालीन है. युधिष्ठिर पाँच भाइयों की टीम के अगुआ थे. धर्मराज के नाम से भी जाने जाते थे. वस्तुतः धर्मराज नाम उनकी ढाल था, धर्म के नाम पर वह अपनी साम्यवादी और वामपंथी सोच को आगे बढ़ाने का काम करते थे. इस का सब से बढ़िया उदाहरण हैं – द्रौपदी. अर्जुन ने मछली की आँख में निशाना लगाने की शर्त जीती और साथ ही जीता द्रौपदी का पाणिग्रहण. जब सभी भाई माता कुंती के पास पहुँचे तो कुंती ने बगैर सच जाने, आम भारतीय मतदाता की तरह, कह दिया कि जो भी लाए हो सभी भाई बाँट लो. बाद में सत्य के उजागर होते ही कुंती ने अपने शब्द वापस लेने की भरपूर कोशिश की, लेकिन डाले गए मत की तरह वापसी संभव नहीं थी. आप महाभारत में हरेक पाण्डव के कुंती के अलावा कम से कम एक और पत्नी का उल्लेख पाएंगे, सिवाय युधिष्ठिर के. ऐसा क्योंकर संभव हुआ? दरअसल यह वामपंथी सोच थी – अर्जन कोई भी करे सब में बराबर बंटे. युधिष्ठिर इस सत्य को जानते थे कि वह भी वामपंथियों की तरह हैं कुछ भी कमा नहीं सकते, लेकिन साम्यवाद की आड़ में उपभोग तो कर ही सकते थे. इसमें एकपत्नीव्रती होने जैसी कोई बात नहीं थी.

समय बीतता रहा. फासीवादी सुयोधन (कालान्तर में दुर्योधन) ने वामपंथ को सत्ता देने से मना कर दिया. बल्कि समझ लें कि जैसे इंदिरा ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी वैसे ही सुयोधन भी सत्ता के हस्तांतरण से मुकर गया. मुकरता भी क्यों नहीं उस के पास विशाल सेना थी, बड़े बड़े राजनैतिक सलाहकार थे और सब से बढ़ कर सूतपुत्र (दलित) कर्ण उस के पक्ष में था. जब साम्प्रदायिक पांडव कर्ण का उपहास करते तब सिर्फ युधिष्ठिर कर्ण का पक्षधर होता. फिर वही वामपंथी नीति – दलित उठ खड़े हुए तो भारत का इतिहास बदल जाएगा. यहाँ तक कि घोषणा कर दी यदि सत्ता हस्तांतरण होती है तो वह एक दलित (वैसे कहा था कि अपने बड़े भाई को; पर भावना वही थी) को अपना राजा स्वीकार कर लेंगे. उद्देश्य सत्ता की मलाई खाने का था – आप के सामने आज भी कर्णाटक का उदाहरण है. खैर, कर्ण नहीं माना. मानता भी क्यों? उस के पास दलित शक्ति थी, जिसका उपयोग वह कभी भी कर सकता था.

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चला था. वामी युधिष्ठिर के नेतृत्व में साम्प्रदायिक (शेष) पाण्डवों की सरकार चल रही थी और कृष्ण अन्ना हज़ारे की तरह नेपथ्य में धकेल दिए गए थे. पाँचों भाई यात्रा पर थे, युधिष्ठिर को प्यास लगी. जैसी की वामी परम्परा है – खुद कुछ मत करो, दूसरों का दोहन करो और उसे साम्यवाद का चोला पहना दो, युधिष्ठिर ने सहदेव को आदेश दिया – जल ले कर आओ. पास के सरोवर में सहदेव ने मटकी डाली. सरोवर में एक यक्ष का वास था.

इधर सहदेव की मटकी ने जल का स्पर्श किया उधर यक्ष का अट्टहास गूँजा – “सावधान सहदेव, अगर जल चाहते हो तो मेरे प्रश्नों का का उत्तर दो”.
सहदेव – ठीक है पूछो जो पूछना चाहते हो
यक्ष – कौन हूँ मैं?
सहदेव:- तुम एक अतिक्रमंकारी हो. शीघ्र ही इस क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करने का शपथ लेता हूँ.
बिजली कौंधी और सहदेव ढेर.

सहदेव नहीं लौटा तो नकुल वहां आया, फिर वही हुआ. यक्ष ने वही प्रश्न पूछा.
यक्ष – कौन हूँ मैं?
नकुल:- तुम भविष्य में केजरीवाल बनोगे. तुम एक नौटंकीबाज हो.
बिजली कौंधी और नकुल ढेर.

कुछ देर बाद अर्जुन वहां आया, फिर वही हुआ. यक्ष ने वही सवाल पूछा.
यक्ष – कौन हूँ मैं?
अर्जुन – तुम कलियुग में वाड्रा के नाम से जाने जाओगे. वर्तमान में यक्ष के रूप में सरकारी जमीन पर कब्ज़ा किये बैठे हो. तुम्हें यह जमीन दुशासन ने दिलवाई है जो कलियुग में हुड्डा के नाम से जाना जाएगा.
बिजली कौंधी और अर्जुन ढेर.

कुछ देर बाद भीम वहां आया, फिर वही हुआ. यक्ष ने वही सवाल पूछा.
यक्ष – कौन हूँ मैं?
भीम, जो एक गौरक्षक था, हत्थे से उखड़ गया – ज्यादा चूंचपड़ की तो उठा के पटक दूंगा और तुम्हारे रुधिर से अपनी प्यास बुझाऊंगा.
बिजली कौंधी और भीम ढेर.

अंत में प्यास का मारा युधिष्ठिर खुद वहाँ पहुंचा.

पहले की तरह ही यक्ष ने उसे भी ललकारा और पूछा – कौन हूँ मैं?
युधिष्ठिर – तुम माइनॉरिटी हो, यक्ष जाति के लोग कम होते हैं और चूँकि तुम अल्पसंख्यक हो तुम्हारे साथ बहुत ज्यादतियाँ हो रही हैं, यहाँ तक कि तुम्हारे पास रहने को अपना घर भी नहीं है, तुम सरोवर में छुप कर रहते हो.

यक्ष – ह्म्म्म उम्दा, जीवन का उद्देश्य क्या है?
युधिष्ठिर – जीवन का उद्देश्य सेक्युलरिज्म है

यक्ष – संसार में दुःख क्यों है?
युधिष्ठिर – संसार में दुःख बहुसंख्यकों के कारण है. हिन्दू मुसलमान को मार रहा है, ईसाई को मार रहा है, यहाँ तक कि हिन्दू को भी मार रहा है. दरअसल संसार में दुखों की जड़ भगवा आतंकवाद ही है. तुम जैसे अल्पसंख्यक तो शांतिप्रिय लोग हैं जो बस अपने मत के प्रसार के लिए अक्सर अनिवार्य हिंसा के सहारे अपना अस्तित्व बचाए रखने में सफ़ल हो रहे हैं. मेरी सरकार में तुम्हें सभी सुविधाएं मिलेंगी. बस हमें चन्दा और Vote देते रहना.

यक्ष – भाग्य क्या है?
युधिष्ठिर – अल्पसंख्यक समुदाय में पैदा होना, या कोटे वाली जाति में पैदा होना ही भाग्य है।

यक्ष – सुख और शान्ति का रहस्य क्या है?
युधिष्ठिर – सदैव हिन्दू धर्म की निंदा करना, हिन्दुओं की हत्याओं को गौण मानना, माइनॉरिटी पर हुई छोटी छोटी से घटना की घोर निंदा करना, प्रधान मंत्री का इस्तीफ़ा माँगना ही सुख और शान्ति का रहस्य है

यक्ष – चित्त पर नियंत्रण कैसे संभव है?
युधिष्ठिर –जब कभी भी हिन्दू धर्म पर कोई आक्षेप या प्रहार हो तो वहां से हट जाना या फिर तटस्थ हो जाने से चित्त पर नियंत्रण संभव है

यक्ष – सच्चा प्रेम क्या है?
युधिष्ठिर – अपने धर्मं का अनादर, दूसरो का आदर

यक्ष – बुद्धिमान कौन है?
युधिष्ठिर – जो बिना कोटे के भी सरकारी नौकरी पा ले वही बुद्धिमान है

यक्ष – कमल के पत्ते में पड़े जल की तरह अस्थायी क्या है?
युधिष्ठिर – भारत में हिन्दुओं का भविष्य

यक्ष – नरक क्या है?
युधिष्ठिर – दोज़ख का पर्यायवाची शब्द

यक्ष – दुर्भाग्य का कारण क्या है?
युधिष्ठिर – कलियुग में भारत का प्रधान मंत्री मोदी

यक्ष – सौभाग्य का कारण क्या है?
युधिष्ठिर – कलियुग में दिल्ली का मुख्यमंत्री केजरीवाल

यक्ष – सारे दुःखों का नाश कौन कर सकता है?
युधिष्ठिर – मोदी को छोड़ के कोई भी कर सकता है, मोदी बस दुःख ही दे सकता है

यक्ष – दिन-रात किस बात का विचार करना चाहिए?
युधिष्ठिर – देश में सेक्युलरिज्म की तूती कैसे बोले?

यक्ष – सबसे बड़ा प्रश्न क्या है
युधिष्ठिर – बीफ बैन आखिर क्यों?

यक्ष – काजल से काला क्या है?
युधिष्ठिर – दो हजार दो गुजरात दंगो के दाग

यक्ष – सबसे सम्मानित लोग कौन है?
युधिष्ठिर – अकादेमी अवार्ड विजेता लेखक और कवि, जिन्होंने अपने अवार्ड्स की वापसी कर दी.

यक्ष – सबसे बड़ा सत्य क्या है?
युधिष्ठिर – कलियुग में देश में कभी भी कोई दंगे नहीं हुए, जैसे ही मोदी PM बना वैसे ही दंगे शुरू हो गए

यक्ष – सबसे बड़ा असत्य क्या है?
युधिष्ठिर – भारत देश प्रगति कर रहा है, या फिर कर भी सकता है

यक्ष – कौन सी विचारधारा सबसे उत्तम है?
युधिष्ठिर – वामपंथी

यक्ष – कौन सी विचारधारा सबसे निम्न है?
युधिष्ठिर – राष्ट्रवादी

और अंतिम प्रश्न :
यक्ष ― संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
युधिष्ठिर ― हज़ारों वर्षों तक ज़ुल्म, दर्दनाक हत्यायें, अनगिनत मंदिरों के ध्वंस के पश्चात देश के विभाजन और सेक्युलर तथा वामपंथी तत्वों के भारत में प्राकट्य के बाद भी हिंदू राम मंदिर बनाने और हिंदूराष्ट्र स्थापित करने का स्वप्न देखते हैं, यही सबसे बड़ा आश्चर्य है.

यक्ष ने प्रसन्न हो कर युधिष्ठिर को न सिर्फ जल प्रदान किया बल्कि उन श्रेष्ठ प्रश्नोत्तरों के बदले में एक भाई को पुनर्जीवित करने का वरदान भी दिया. युधिष्ठिर ने नकुल को जीवित करने की मांग की. यक्ष ने पूछा – हे धर्मराज, अर्जुन और भीम के रहते नकुल क्यों? युधिष्ठिर मुस्कुराया और कहा – यक्ष, आजकल की युवतियाँ धनुर्धर और पहलवानों को कोई भाव नहीं देतीं, उन्हें तो बस TDH चाहिए, अब नकुल में वह खासियत है. उसे कोई और मिलेगी तो शेयरिंग तो होगी, वामपंथ की परम्परानुसार. यक्ष ने युधिष्ठिर की साफगोई से प्रसन्न हो कर सभी भाइयों को पुनर्जीवित कर दिया.

झारखण्ड की राजनीति

बेरोज़गार आदमी जो न करे थोड़ा है. हम भी अपनी बेरोज़गारी से आजिज़ आ कर एक अख़बार के सम्पादक महोदय के हुज़ूर में पहुँच गए. ज़नाब, कोई काम दें तो इस कीबोर्ड पीटू, अब कलम का ज़माना तो रहा नहीं कीबोर्ड ही चलता है, का कुछ कल्याण हो. साहेब ने फ़रमाया लिख लाओ, छपने लायक हुआ तो छाप भी देंगे लेकिन उज़रत की कोई उम्मीद न रखें. हम ने सोचा बैठे से बेगार भला. रोज़गार तो मिला, उज़रत न मिली. समय आएगा और तब तलक हम भी इस फ़ानी दुनिया में रहे तो वह भी हासिल हो ही जाएगी.

पूछा – किस विषय पर लिखें. ज़वाब मिला – आप लिखते किस शैली में हैं. हम ने कहा – ज़िंदगी के इतने चमाट खा चुके हैं कि अपना नाम भी बोलते हैं तो व्यंग्य ही लगता है, लिहाज़ा लिखता भी वही हूँ. साहेब बोले – वही लिख लाओ. हम ने कहा – सरकार, कोई ख़ास विषय? थोड़ी देर तक दिमाग पर जोर लगाया फिर कहा – झारखण्ड की राजनीति पर लिखो. छूटते ही खाकसार ने अर्ज़ किया – असंभव. सम्पादक साहेब के तेवर चढ़े – क्यों असंभव? हमने कहा – हुज़ूर, व्यंग्य गंभीर मसलों पर लिखा जाता है, यह चोट होती है. अब चुटकुले पर व्यंग्य कैसे लिखा जाए?

हमने सोचा दुनिया के कई रंग देख लिये अब यह तज़ुर्बा भी सही. आखिर ऐसे ही सब से बड़े बच्चन नहीं कह गए कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती. यह आज़माइश भी हो ले कि मजाक और चुटकुले पर व्यंग्य लेखन हो.

झारखण्ड को राज्य बने कोई 18 साल का वक्फ़ा तय होने को है. इस उम्र में नस्लें बालिग़ हो जाती हैं, अपनी सरकार तय करती हैं, बेटियों के बाप की चिंता बढ़ जाती है कि कैसे बेटी के हाथ पीले करें. पर ज़नाब झारखण्ड तो झारखण्ड है – बालिग़ होने की बात तो अलहदा, ढंग से दूसरी ज़मात भी न पहुँची. हमारे Status में बस एक बदलाव आया – पहले बिहारी कहे जाते थे, अब झारखण्डी कहे जाते हैं. बाकी यह राज्य क्यों बना यह बात अभी भी राज़ है. यह राज़ अब राज़ ही रहेगा क्योंकि अटल जी, ख़ुदा बख्शे, रहे नहीं और अडवाणी जी हाशिये पर हैं.

ख़ुदा झूठ न बुलवाए, जितने वायदे किये गए उस का एक फ़ीसद भी पूरा हो जाता तो हम भूटान से अधिक शुद्ध हवादार और क्योटो से अधिक आधुनिक होते. मोदी जी तब न क्योटो की बात करते न केजरीवाल साहेब लन्दन की, बस हम ही हम होते. पर वायदे अक्सर, झारखण्ड के मद्दे नज़र; हमेशा, भुला दिए जाते हैं. अमा, क्या क्या सुनाएँ. रोज़ाना, खुदा बख्शे गर चमड़े की ज़ुबान फिसल जाए तो, सैकड़ों न सही दर्ज़नों की तादाद में ऐलान होते ही हैं. लेकिन बस ऐलानिया ऐलान होते हैं. हम भी जानते हैं उन्हें न कभी पूरा होना है और न कभी होंगे, लिहाज़ा एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकालने की ज़हमत भी नहीं उठाते, बल्कि यूँ समझ लीजिये कि इन ऐलानों के लिए कानों में रूई के फ़ाहे ठूँस लेते हैं. मुलाहिज़ा फ़रमाएँ – 2015 में ऐलानिया कहा जाता है – 2019 तलक न सिर्फ 24 घंटे बिजली आएगी, बल्कि दूसरे सूबे को भी बेचेंगे. ज़नाब 24 घंटे बिजली आई भी, बस रोज़ाना न आई. हफ्तावार 24 घंटे आई, लेकिन आई. फिर 2018 में यही ऐलान फिर हुआ बस साल 2019 न रहा 2022 हो गया. आलम यह है कि अगरचे दिन में 6 घंटे लगातार बिजली बहाल रहे तो लगता है आज ही होली, दिवाली, ईद, बड़ा दिन सब इकट्ठे है. उस पर कमाल की सोच देखिये, बिजली वालों को देने के लिए पैसे कम पड़े तो बिजली की दरें बढ़ा दीं. अमा, बिजली दोगे तो खपत बढ़ेगी, खपत बढ़ेगी तो आमद बढ़ेगी. लेकिन जब सीधा सा तरीक़ा, दर बढ़ाने का, दस्ती हाज़िर हो तो मगज़मारी कौन करे और क्यों करे? खुदा झूठ न बुलवाए, दुनिया के आलादिमाग Town Planners भी यहाँ Fail हैं. राजधानी में सडकों से ऊपर नाले बने हुए हैं, वह भी ऐसे जिसमें न पानी घुस सकता है न बह सकता है, ज़ाहिरन निकल भी नहीं सकता है. हाँ, नाली की दीवारें सड़कों को नाली ज़रूर बना देती हैं. हमें फ़ख्र है इस बात का कि दुनिया में राँची से चौड़ी नालियाँ हो ही नहीं सकती. सडकें, हुज़ूर तौबा बुलवाइए, ऐसी हैं कि जच्चगी के लिए हस्पताल जाने की ज़रुरत ही नहीं बस रिक्शे पर बिठा कर एक चक्कर लगवाएँ, बच्चा हाज़िर.
ऐसा नहीं कि इतने पर ही बस हो जाए. पर किस किस को याद कीजिये किस किस को रोइये आराम बड़ी चीज है मुँह ढँक कर सोइये. सोइये भी तभी जब झारखण्ड के विश्व प्रसिद्ध मच्छरों से निज़ात मिल सके.

कृष्ण का दण्ड

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चला था. सभी वीरगति प्राप्त योद्धाओ का अंतिम संस्कार हो चुका था. यम के दरबार में सारे उपस्थित थे अपने अपने कर्मों का भोग प्राप्त करने को. यथा योग्य उन सब को बारी बारी स्वर्ग और नर्क प्रदान किया गया. गुरु द्रोण और पितामह भीष्म को भी नर्क मिला. उन्हें अवगत करवाया गया कि आप वस्तुतः स्वर्ग योग्य हैं लेकिन कुछ अपराधों के कारण आपको कुछ समय नारकीय यातनाएं भोगनी होंगी. शोकमग्न भीष्म और द्रोण ने कोई प्रतिवाद नहीं किया. उन्हें कदाचित आश्चर्य हुआ जब उन्होंने कर्ण को भी वहाँ देखा. धर्म और दानवीरता का साक्षात प्रमाण कर्ण और नरक में, जिस ने कभी इंद्र को भी युद्ध में पराजित किया था, जिस के समक्ष साक्षात यमराज भी आने से भय खाते थे वह शूरवीर योद्धा नर्क में!

समय बीतता गया. तीनों महान आत्माओं को अब नर्क से स्वर्ग की तरफ प्रस्थान करना था अपने अच्छे कर्मों का फल लेने.

नर्क के द्वार के बाहर निकलते ही साक्षात श्रीकृष्ण के दर्शन हुए. “केशव तुम यहाँ कैसे?” भीष्म के गंभीर वाणी गूंजी. “मैं स्वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर आप तीनों को ससम्मान ले जाने आया हूँ.” श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया. “केशव नारकीय यातनाओं से देह जरूर क्लांत हो चला है, लेकिन यह प्रश्न अभी भी जागृत है कि हमें नर्क क्यों मिला?” द्रोण ने पूछा. कृष्ण ने कहा – “आप दोनों श्रेष्ठों को एक विशेष कारण से यह यातना मिली, आप दोनों ने सुशासन के अमानवीय व्यवहार का विरोध नहीं किया था. आप के समक्ष एक नारी की अस्मिता तार तार हो रही थी और आप दोनों ने मौन धारण कर लिया. पितामह ने तो नेत्र भी झुका लिए थे, लेकिन क्या उस से उन के मौन से पापकर्म धुल जाते? स्त्री के शील की रक्षा करने के बदले मौन धारण करना उस कुकृत्य को स्वीकृति देना ही हुआ गुरुवर और यह महापाप है.” भीष्म ने अपनी मौन स्वीकृति दे कर श्रीकृष्ण के कथन को स्वीकार कर लिया.

श्रीकृष्ण ने तब गुरु द्रोण के बगल में खड़े कर्ण को इंगित करते हुए कहा – “गुरुवर, यह भी मनुष्य था, इस में भी प्रतिभा थी लेकिन आप ने इसे अपना शिष्य स्वीकार नहीं किया क्योंकि यह निम्न वर्ण का था. और अपनी समस्त प्रतिभा और वीरता के बाद भी और सत्य के सार्वजनिक होने के बाद भी यह आपके लिए सूतपुत्र ही था क्योंकि यह पार्थ का प्रतिद्वंद्वी था और आप को यह स्वीकार्य नहीं था कि आपके प्रिय शिष्य से उत्तम धनुर्धर विश्व में कोई और हो. हे गुरुवर, आप ने न केवल गुरु के पद की गरिमा भी कम की अपितु मानव मात्र में विभेद किया. दैवीय न्यायालय में यह भी एक पापकर्म था अतः आप ने पितामह से थोड़ा अधिक समय नर्क भोगा.” चारों स्वर्ग की तरफ चल पड़े.

रास्ते में कृष्ण ने पूछा – “राधेय तुम अपने अपराध के प्रति कोई जिज्ञासा नहीं रखते?” कर्ण ने कहा – “कन्हैया, मैं तुम्हारा व्यक्तिगत मित्र भी था, तुम्हारे सत्संग के कारण मुझे अपने अपराधों का ज्ञान है. तुम यही कहोगे कि मैंने अपनी जन्मदात्री माता को कष्ट दिया या वीर अभिमन्यु की ह्त्या में योगदान दिया. मित्र, मैं सिर्फ अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था. मैं अपनी पालनहार माता को कैसे भूल जाता? मैं उस मित्र को कैसे भूल जाता जिसने मुझे सम्मान दिलाया? अभिमन्यु चक्रव्यूह में फँसा था और चक्रव्यूह का अर्थ ही महारथी को फाँस कर उसे वीरगति देना होता है. लेकिन यदि यह सब पापकर्म थे तो मुझे किंचित ग्लानि नहीं है. और यदि नर्क प्रवास से आत्मा की शुद्धि होती है तो मेरी आत्मा तुम्हारे दैवीय विधानों के अनुरूप अभी भी अशुद्ध है, मुझे नर्क में पुनः छोड़ सकते हो. पर मेरे विचार तब भी यही रहेंगे. हाँ मैं अवश्य यह जानना चाहूँगा कि समस्त प्रपंच के रचयिता तुम थे फिर भी तुम किसी दण्ड के भागी क्यों नहीं हुए?”

कृष्ण ने कहा – “साधु साधु, वीर कर्ण से मुझे इसी उत्तर की अपेक्षा थी और मैं जानता था कि यह प्रश्न कभी न कभी मेरे समक्ष अवश्य आएगा.” “हे मित्र और श्रेष्ठ जन, मुझ से दीर्घ और कष्टदायी दण्ड आप में किसी ने नहीं भोगा है. मैं सदैव स्त्रियों का रक्षक बना रहा, मैंने सदैव सत्य और कर्तव्यनिष्ठा को सर्वोपरि रखा. लेकिन आज मेरे प्रिय भारतवर्ष की तरफ दृष्टि डालो, दैनिक रूप से ललनाओं का वस्त्र हरण हो रहा है और मेरे पास इतनी क्षमता ही नहीं कि मैं उनकी शील रक्षा कर सकूँ. महान भारतवर्ष में सत्य और कर्तव्यनिष्ठा के कोई अर्थ ही नहीं रह गए हैं, जो इनका पालन करता है उन्हें विक्षिप्त माना जाता है. आप सभी द्वापर में ही दण्ड मुक्त हो गए, मुझे अभी कलियुग के समापन तक यही दण्ड शिरोधार्य करना है. मेरे अपने वंशज मेरी विचारधारा को छोड़ कहेंगे – बालक हैं, बालकों से नटखटपन हो ही जाता है.” “हे गुरुजन, हे राधेय क्या मुझ से बड़ा दण्ड आप लोगों को मिला है.”

स्वर्ग का द्वार आ चुका था.

औरत का चरित्र

औरत का कोई चरित्र नहीं होता है. तक़लीफ़ हुई जानकार. चलिए आप के नज़रिये से एक औरत को देखते हैं.

आप एक नारी में पहले क्या देखते हैं? उसके वस्त्र, उसका Make Up. साड़ी में है तो, नाभी दर्शना साड़ी क्यों है? ब्लाउज से Cleavage क्यों नज़र आ रहा है? बिना बाजू के ब्लाउज क्यों पहन रखी है? शिफॉन की बदन चिपकू साड़ी क्यों पहन रखी है? होठों पर लाली इतनी गहरी क्यों है? नैनों में काजल किसे क़त्ल करने को लगाया है? साली चालू चीज है.

अब अगला – स्कर्ट क्यों पहना? पहना तो पहना; इतना छोटा क्यों पहना? टांगों की नुमाइश जरूरी है क्या? जीन्स या पतलून क्यों पहनी? साड़ी या सलवार सूट में क्या खराबी है? ऐसे कपड़े ही तो लड़कों को उत्तेजित करते हैं, फिर दुहाई देंगी कि लड़कों ने छेड़खानी की. खुद को नियंत्रण में रखेंगी नहीं, बदनाम लड़के होंगे.

किसी से बात करने का यह क्या सलीका हुआ, न जान न पहचान चेहरे पर सौम्यता का ढोंग और हल्की मुस्कान. यह खुला निमंत्रण नहीं तो और क्या है?

यह आज की बात नहीं है, युगों की दास्तान है. अग्नि परीक्षा के बाद भी सीता संदिग्ध ही रहीं. क्यों? क्योंकि वह नारी थीं.

स्त्रियों का कोई चरित्र नहीं होता, वह तो बस वैसा होता है जैसा पुरुष तय करता है.

गिद्ध

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी – एक राजा होता है जिसे देवता का आशीर्वाद मिला होता है कि पशु पक्षियों की भाषा बोल और समझ सकता है. कहानी के इसके बाद का अंश मेरी कहानी में प्रासंगिक नहीं है. बालमन इस गल्प को सत्य मान बैठा और तय कर लिया कि यह गुण किसी भी तरह मुझे भी हासिल करना है. लेकिन कैसे? देवता कहाँ खोजूँ? बचपन में यह भी सुना था कि मन से यदि तप करो तो ईश्वर दर्शन देते हैं और ख़ास तौर पर बच्चों की बातें तो ईश्वर जरूर सुनते हैं. बालमन बड़ा सरल होता है, हर बात पर भरोसा कर लेता है. हमने भी तय किया सच्चे मन से तप करूंगा. पर तप तो हिमालय पर होता है. अब हिमालय कहाँ से लाऊँ? तभी महर्षि बाल्मीकि याद आए, उन्होंने एक जंगल में तप कर ही ज्ञान प्राप्त किया था. घर के पीछे जंगलनुमा झाड़ी थी, वहीं शुरु हो गया. देर रात तक तप करता फिर घर आ कर सो जाता. आखिर अगले दिन स्कूल भी तो जाना होता था. न जाने पर पिटाई होनी तय थी. आखिरकार देवता प्रसन्न हुए. कौन से वाले आए यह याद नहीं क्योंकि मैंने उन से परिचय नहीं माँगा. बहरहाल, देवता आए और उन्होंने वर दिया कि मैं पशु पक्षियों से बातें कर सकने में सफल होऊँगा.

अगली सुबह वरदान की टेस्टिंग पर निकला. छुट्टी का दिन था. माँ से कहा थोड़ी देर घूम कर आता हूँ और फिर अपनी तपस्थली से आगे की तरफ जंगलों में निकल गया. एक जगह ढेर सारे डरावने से पक्षी बैठे हुए थे. एक ने दूसरे से पूछा – यह कौन है? जवाब मिला – मनुष्य. फिर समवेत स्वर में सुनाई दिया – आक् थू. एक को छोड़ बाकी सभी उड़ गए. जो बचा उस से बात करने की ठानी.
मैंने कहा – आप कौन हैं पक्षी?
जवाब मिला – गिद्ध.
मेरा जी मिचलाने लगा, सुना था गिद्ध सड़ी गली लाशें खाते हैं. उसने मेरे मन को पढ़ लिया. कहा – बालक मुझ से घृणा हो रही है. जबकि तुम मनुष्य घृणा के पात्र हो.
मेरा मनुष्यत्व जाग उठा, तमक कर कहा – मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है.
गिद्ध – किसने कहा?
मैं – हमारे विद्वानों ने.
गिद्ध – अर्थात आपने खुद को स्वयम् ही सर्वश्रेष्ठ मान लिया. खुद को सर्टिफिकेट दे डाला और खुद ही उसे मान्यता दे दी? केजरीवाल हो क्या? (कृपया रचनात्मक स्वतंत्रता के तहत काल को भूल जाएं)
खुद की हत्तक होते देख मैं बौखला गया – हम आपकी तरह सड़ी गली लाशें नहीं खाते हैं.
पर क्या कभी सोचा है कि वे लाशें हमें कौन देता है? तुम मनुष्य ही तो. आप मनुष्यों ने मनुष्यता के पैमाने बनाए हैं, उन्हीं पैमानों पर एक भी मनुष्य दिखा दो. हमारे यहाँ कोई पैमाना नहीं है. जितनी बड़ी तुम्हारी धरती है उतना बड़ा ही हमारा आकाश है, लालच के कारण तुम्हें धरती छोटी पड़ रही है जबकि हम तुमसे कई गुणा अधिक हैं फिर भी न घर के लिए झगड़ा है और न भोजन के लिए.
हठी बालक कुतर्क पर उतर आया – आपके बच्चे आप को छोड़ कर उड़ गए हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता.
बूढ़ा गिद्ध हँसा – बालक वे मुझे छोड़ कर नहीं गए हैं, वे भोजन की तलाश में गए हैं, लौटते समय सभी अपनी चोंच में मेरे खाने लायक भोजन लेते आएँगे.
पर वे गए क्यों? मैं कमजोर सा बालक कब तक आप से लड़ सकता था, मुझे मार कर पूरा झुण्ड खा लेता.
हम मनुष्य नहीं हैं, हम किसी के मरने का कारण नहीं बनते. बल्कि कोई भी पशु या पक्षी किसी की मृत्यु की कामना नहीं करता. आप अपने क्षेत्र में रहे हमें अपनी दुनिया में रहने दें, हम कभी हमला नहीं करेंगे. हम अपने बुजुर्गों की मौत की प्रतीक्षा नहीं करते कि कब मरें और हमें उनकी अर्जित संपत्ति हथियाने का अवसर मिले. हम पक्षी अपने माता पिता के अनुग्रही होते हैं कि जब वे उड़ नहीं पाते तब हम पालन पोषण करते हैं. माता पिता के घोंसले के लिए कभी झगड़ा नहीं करते. कभी यह विचार भी मन में नहीं आया कि माता पिता भाई बन्धु न रहें तो सारी संपत्ति मेरी. और वह भी किस प्रयोजन के लिए – जिसे यहीं छोड़ कर जाना है.
इस सत्य ने मेरी आँखें खोल दी – क्या हम सच में ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं?

कुछ अपने बारे में

खाकसार को दुनिया श्री हापट के नाम से जानती है. आप फ़रमाएंगे यह क्या नाम हुआ? दरअसल माँ बाप ने कुछ बढ़िया सा नाम रख छोड़ा था, कैसे वह नाम गुम गया और कैसे उसकी जगह हापट ने ने ली, यह तो मुझे खुद भी याद नहीं. लकिन, इतना तय है कि याद्दाश्त की उस सीमा तक भी अपना नाम हापट ही सुनाई देता है. बहरहाल, अब आपका अगला सवाल होगा कि अपने नाम के आगे खुद कौन श्री लगाता है. बज़ा. पर बड़े बुजुर्ग कह गए हैं जो अपनी इज्ज़त खुद न करे उसकी इज्ज़त भला दुनिया क्यों करे, लिहाज़ा हापट के आगे हमने खुद ही श्री चिपका लिया. दुनिया जानती और मानती है कि किसी मर्दजात के नाम के आगे अगर श्री लगा दिया जाए तो वह इज्ज़तदार नस्ल में शुमार हो जाता है.
खाकसार यह भी अर्ज़ कर देना चाहता है कि उसे बहकने की आदत है, लिहाज़ा इसे बर्दाश्त कर लें, या फिर Time और Net Data आपने खोटी कर ली है और मैंने बज़रिये Hit उसकी वसूली कर ली है.

इस चिरकुट प्रयास के पीछे कई लोगों का हाथ है. यहाँ गौर करने की बात यह है कि उन हाथों में कोई भी हाथ किसी नारी का नहीं था, लिहाज़ा सफलता के तयशुदा पैमाने पर यह कोशिश पहले ही नाकामयाब है. पर कहते हैं – हिम्मते मरदां, मददे ख़ुदा. खैर, दो एक नाम, जिन्होंने वस्तुतः मेरी गर्दन पर हाथ रख दिया कि अब लिख भी मारो, के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन, मेरी तरफ से; आपकी आप जानें, आवश्यक है. फ़ौरी तौर पर तीन नाम याद आते हैं – मेरे अग्रज अजय नाथ, मेरे अनुज इंद्रदेव और एक और अनुज अरुणोदय. अरुणोदय स्वयं एक मूर्धन्य लेखक है. मुझे कोई आशंका नहीं है, मेरा दृढ़ विश्वास है कि उन्होंने मुझे मेरे लेखन की औक़ात दिखाने के लिए ही प्रेरित किया है. वैसे यह बेहतर तरीका है खुद को खुश करने का. अगला पिट गया, अब मैं बादशाह. इसे इस तरह भी समझ लें कि छोटे भाई की कामयाबी के लिए बड़े भाई ने एक बड़ा सा त्याग किया.
वैसे तो अधिकाँश रचना बस ऐसे ही बैठे ठाले की है, लेकिन कुछ मूर्धन्य लेखकों की लेखनी भी शामिल होंगी ताकि आप के समय और Net Data की कीमत वसूल करने का कुछ तो मरहम लगे आप को.